अलंकार: परिभाषा, भेद और उदाहरण — शब्दालंकार, अर्थालंकार और पहचानने की तालिका
अलंकार काव्य की भाषा को सजाते हैं। चमत्कार शब्द में हो तो शब्दालंकार (अनुप्रास, यमक, श्लेष), अर्थ में हो तो अर्थालंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति)। आगे उदाहरण, पहचान-तालिका और अभ्यास हैं।
अलंकार किसे कहते हैं
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है "आभूषण"। जैसे गहने शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार काव्य की भाषा की शोभा बढ़ाते हैं। परिभाषा सीधी है: काव्य के शब्दों या अर्थों में जो चमत्कार पैदा करके उसकी सुंदरता बढ़ाता है, उसे अलंकार कहते हैं।
विद्यालय की हिंदी में अलंकार का प्रश्न लगभग हमेशा एक ही रूप में आता है: "निम्नलिखित पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?" इसलिए इस पृष्ठ का लक्ष्य दो चीज़ें हैं। पहली, हर अलंकार की ऐसी परिभाषा जो याद रह जाए। दूसरी, पंक्ति देखकर पहचानने की एक व्यावहारिक विधि, ताकि परीक्षा में अंदाज़े की जगह तर्क से उत्तर दिया जा सके।
अलंकार का अध्ययन कक्षा 9 से 12 की हिंदी व्याकरण में, राज्य बोर्डों और CBSE के पाठ्यक्रम में, और स्नातक स्तर की हिंदी, शिक्षक पात्रता तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में किया जाता है। पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें बदलती रहती हैं, इसलिए जिस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उसकी वर्तमान पाठ्यपुस्तक और पाठ्यक्रम-सूची को अंतिम मानिए।
अलंकार के मुख्य भेद
अलंकार मुख्यतः दो वर्गों में बाँटे जाते हैं।
| वर्ग | चमत्कार कहाँ है | प्रमुख अलंकार |
|---|---|---|
| शब्दालंकार | शब्द की ध्वनि, दोहराव या बनावट में | अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश, वीप्सा |
| अर्थालंकार | शब्द के अर्थ और कल्पना में | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, अन्योक्ति |
कुछ पाठ्यपुस्तकें उभयालंकार (जहाँ शब्द और अर्थ दोनों में चमत्कार हो) को तीसरा वर्ग मानती हैं। विद्यालय स्तर पर पहले दोनों बड़े वर्ग पक्के कर लेना काफ़ी है।
पहचानने की सबसे सरल कसौटी यह है: शब्द को उसके पर्यायवाची से बदलकर देखिए। अगर चमत्कार चला जाए, तो वह शब्दालंकार था, क्योंकि चमत्कार उस शब्द की ध्वनि में था। अगर चमत्कार बना रहे, तो वह अर्थालंकार था, क्योंकि चमत्कार अर्थ में था।
शब्दालंकार
अनुप्रास
जहाँ एक ही वर्ण या वर्णों की आवृत्ति बार-बार हो, वहाँ अनुप्रास होता है।
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि॥ — गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस
यहाँ "क" और "न" की आवृत्ति ध्वनि का संगीत बनाती है। पाठ्यपुस्तकों में अनुप्रास के उपभेद भी पढ़ाए जाते हैं, जैसे छेकानुप्रास (वर्णों की एक बार आवृत्ति), वृत्त्यनुप्रास (कई बार आवृत्ति) और लाटानुप्रास (शब्द या वाक्यांश की आवृत्ति, अर्थ वही पर तात्पर्य भिन्न)। परीक्षा में पूछे गए प्रश्न की माँग देखिए: अधिकतर जगह केवल "अनुप्रास" लिखना पर्याप्त होता है।
पहचान: ध्वनि की गूँज। पंक्ति को ज़ोर से पढ़ने पर एक ही अक्षर बार-बार कानों में आए।
यमक
जहाँ एक ही शब्द एक से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो, वहाँ यमक होता है।
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाइ। उहिं खाएँ बौराइ नर इहिं पाएँ बौराइ॥ — बिहारी, बिहारी सतसई
पहले "कनक" का अर्थ धतूरा है और दूसरे "कनक" का अर्थ सोना। शब्द दो बार है, अर्थ दो हैं। बिहारी कहते हैं कि सोने में धतूरे से सौ गुना अधिक नशा है, क्योंकि धतूरा खाने पर नशा होता है, सोना पाने पर ही।
पहचान: शब्द की आवृत्ति गिनिए। अगर वही शब्द दो या अधिक बार आए और हर बार अर्थ बदले, तो यमक है।
श्लेष
जहाँ एक शब्द एक ही बार आए, पर उसके एक से अधिक अर्थ निकलें, वहाँ श्लेष होता है। श्लेष का अर्थ है "चिपका हुआ", यानी एक शब्द से कई अर्थ चिपके हैं।
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥ — रहीम
यहाँ "पानी" के तीन अर्थ लिए जाते हैं: मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए प्रतिष्ठा और आटे (चून) के लिए जल। पाठ्यपुस्तकों में इसे श्लेष का प्रचलित उदाहरण माना जाता है।
यमक और श्लेष का अंतर। यमक में शब्द कई बार आता है और हर बार अलग अर्थ देता है। श्लेष में एक ही शब्द से एक साथ कई अर्थ निकलते हैं, चाहे वह शब्द एक बार आए या दोहराया भी गया हो। विद्यार्थी सबसे ज़्यादा इन्हीं दोनों में चूकते हैं। रहीम की पंक्ति में "पानी" शब्द कई बार दिखता है, फिर भी पाठ्यपुस्तकें उसे प्रायः श्लेष का उदाहरण मानती हैं, क्योंकि वहाँ "पानी" के कई अर्थ एक साथ खुलते हैं, जबकि यमक में आवृत्ति के हर रूप का अर्थ अलग-अलग तय होता है। इसलिए परीक्षा में याद रखने वाला नियम केवल गिनती नहीं, अर्थ का एक साथ खुलना है। अगर किसी प्रश्न में शब्द की गिनती और अर्थ के बीच उलझन हो, तो अपनी पाठ्यपुस्तक का उदाहरण और उसकी व्याख्या देख लीजिए।
पुनरुक्तिप्रकाश और वीप्सा
शब्द की दोहरी आवृत्ति से भाव को गहरा करना पुनरुक्तिप्रकाश है। कबीर की पंक्ति है:
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। — कबीर
"पढ़ि-पढ़ि" से लगातार पढ़ते रहने का भाव उभरता है। जब आश्चर्य, शोक या घृणा जैसे मनोभाव को प्रकट करने के लिए शब्द दोहराया जाए, तो उसे वीप्सा कहते हैं, जैसे "छि:! छि:! यह क्या किया!" या "हाय! हाय!" इन दोनों में फ़र्क महीन है, इसलिए पाठ्यक्रम में जितना पढ़ाया गया हो, उतना ही पक्का करें।
अर्थालंकार
उपमा
जहाँ दो भिन्न वस्तुओं की समानता बताई जाए, उसे उपमा कहते हैं। इसके चार अंग हैं।
| अंग | अर्थ | उदाहरण "मुख चंद्रमा-सा सुंदर है" में |
|---|---|---|
| उपमेय | जिसकी तुलना की जाए | मुख |
| उपमान | जिससे तुलना की जाए | चंद्रमा |
| वाचक शब्द | समानता बताने वाला शब्द (सा, सी, से, जैसा, समान, सरिस) | सा |
| साधारण धर्म | दोनों में समान गुण | सुंदर |
उदाहरण-वाक्य: "उसकी आँखें कमल जैसी कोमल हैं।" यहाँ आँखें उपमेय हैं, कमल उपमान, "जैसी" वाचक और "कोमल" साधारण धर्म।
पहचान: पंक्ति में सा, सी, से, जैसा, समान जैसा कोई वाचक शब्द मिले और चारों अंग दिखें, तो उपमा। कोई अंग छूट जाए (जैसे धर्म न बताया गया हो), तो उसे लुप्तोपमा कहा जाता है, जो इसी का भेद है।
रूपक
जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न रहे, यानी उपमेय को ही उपमान मान लिया जाए, वहाँ रूपक होता है। इसमें "जैसा" या "सा" जैसा वाचक शब्द नहीं होता।
चरन कमल बंदौं हरि राई। — सूरदास
यहाँ चरण को कमल के समान नहीं कहा गया; चरण ही कमल है। इसलिए यह उपमा नहीं, रूपक है। उदाहरण-वाक्य: "यह जीवन एक संघर्ष का मैदान है।"
उपमा और रूपक का अंतर। उपमा में "सा/जैसा" आता है और दोनों वस्तुएँ अलग रहती हैं; रूपक में दोनों एक हो जाती हैं। एक छोटी कसौटी: वाचक शब्द हटाकर "है" लगा दीजिए। अगर वाक्य स्वाभाविक रहता है और पाठ्यपुस्तक में अभेद की बात की गई है, तो रूपक की ओर बढ़िए।
उत्प्रेक्षा
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा होती है। इसके वाचक शब्द हैं: मानो, मनो, जनु, जनो, मनहुँ, जानो, ज्यों।
सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप परयो प्रभात॥ — बिहारी
पीले वस्त्र पहने श्याम शरीर वाले कृष्ण ऐसे लग रहे हैं मानो नीलमणि पर्वत पर प्रातःकाल की धूप पड़ी हो। यहाँ "मनहुँ" संभावना जताता है, पक्का दावा नहीं करता।
पहचान: "मानो" परिवार का शब्द। उपमा में समानता का कथन होता है; उत्प्रेक्षा में कल्पना होती है।
अतिशयोक्ति
जहाँ किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए कि लोक-सीमा पार हो जाए, वहाँ अतिशयोक्ति होती है।
हनूमान की पूँछ में लगन न पाई आग। लंका सगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥
पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका के जल जाने की बात असंभव रूप से बढ़ाकर कही गई है। यह पाठ्यपुस्तकों में प्रचलित उदाहरण है। उदाहरण-वाक्य: "उसकी आवाज़ सुनकर आसमान फट पड़ा।"
पहचान: पंक्ति पर विश्वास करना असंभव लगे, फिर भी कवि उसे सहज रूप से कह रहा हो।
मानवीकरण
जहाँ प्रकृति या निर्जीव वस्तुओं में मानवीय भावनाओं और क्रियाओं का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण होता है। उदाहरण-वाक्य: "सुबह की किरणें खिड़की पर आकर धीरे से बोलीं, उठो।" किरणों का "बोलना" उन्हें मनुष्य बना देता है।
विरोधाभास और अन्योक्ति
विरोधाभास में पंक्ति ऊपर से परस्पर विरोधी लगती है, पर गहराई में उसका अर्थ सुसंगत निकलता है। उदाहरण-वाक्य: "वह मौन रहकर भी बहुत कुछ कह गया।" अन्योक्ति में कवि कोई बात सीधे न कहकर किसी और (अक्सर पशु-पक्षी या वृक्ष) के माध्यम से कहता है। बड़े आकार पर तंज़ करती कबीर की पंक्ति "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥" को कई पाठ्यपुस्तकें इसी परंपरा के उदाहरण के रूप में देखती हैं। वर्गीकरण पर मतभेद हो सकता है, इसलिए अपनी पुस्तक का वर्गीकरण मानें।
एक नज़र में: पहचान की तालिका
| अलंकार | मुख्य चिह्न | संकेत-शब्द या युक्ति |
|---|---|---|
| अनुप्रास | वर्ण की आवृत्ति | ज़ोर से पढ़ें, वही अक्षर बार-बार |
| यमक | शब्द कई बार, अर्थ अलग-अलग | आवृत्ति गिनें, फिर अर्थ देखें |
| श्लेष | एक शब्द, कई अर्थ | शब्द पर रुककर पूछें: और क्या अर्थ हो सकता है |
| उपमा | समानता, चारों अंग | सा, सी, से, जैसा, समान, सरिस |
| रूपक | उपमेय ही उपमान | "सा" नहीं, सीधे अभेद: "चरण कमल" |
| उत्प्रेक्षा | कल्पना या संभावना | मानो, मनहुँ, जनु, जानो, ज्यों |
| अतिशयोक्ति | असंभव बढ़ा-चढ़ाकर कथन | विश्वास करना कठिन |
| मानवीकरण | निर्जीव में मानवीय भाव | वस्तु बोलती, हँसती, रोती है |
पंक्ति देखकर अलंकार पहचानने की चार कदम की विधि
- पहले ध्वनि सुनिए। पंक्ति को ज़ोर से पढ़ें। कोई अक्षर बार-बार गूँजे, तो अनुप्रास की ओर बढ़ें।
- शब्दों की आवृत्ति देखिए। कोई शब्द दो बार आए और अर्थ बदले, तो यमक। कोई एक शब्द कई अर्थ दे, तो श्लेष।
- वाचक शब्द खोजिए। सा, जैसा, समान मिले तो उपमा; मानो, मनहुँ मिले तो उत्प्रेक्षा; कोई वाचक न हो और दो वस्तुएँ एक कह दी जाएँ तो रूपक।
- अंत में अर्थ की जाँच कीजिए। बात संभव से परे हो तो अतिशयोक्ति; निर्जीव मनुष्य की तरह व्यवहार करे तो मानवीकरण।
एक पंक्ति में एक से अधिक अलंकार हो सकते हैं। परीक्षा में प्रश्न जो माँगे, वही लिखें। अगर "मुख्य अलंकार" पूछा है, तो सबसे प्रमुख एक चुनें और आवश्यक हो तो एक वाक्य में कारण लिख दें।
विद्यार्थियों की सामान्य गलतियाँ
- उपमा और रूपक को मिला देना। "कमल जैसे नयन" उपमा है, "नयन कमल" रूपक है। वाचक शब्द की मौजूदगी ही कसौटी है।
- यमक और श्लेष में गिनती पर ही अटक जाना। यमक में अलग-अलग अर्थ वाली आवृत्ति है, श्लेष में एक शब्द से कई अर्थ। अर्थ की व्याख्या लिखकर उत्तर पक्का कीजिए।
- उत्प्रेक्षा में संभावना को छोड़ देना। "मानो" देखकर रुक जाना ठीक है, पर यह भी देखिए कि कल्पना की जा रही है, तुलना नहीं।
- अनुप्रास को केवल तुकांत समझ लेना। अनुप्रास में आवृत्ति कहीं भी हो सकती है, पंक्ति के अंत में ही नहीं।
- हर अलंकार का नाम तो याद, पर परिभाषा नहीं। परीक्षा में परिभाषा के साथ उदाहरण लिखने पर पूरे अंक मिलते हैं।
अभ्यास प्रश्न
नीचे की पंक्तियों में अलंकार पहचानिए। उत्तर प्रश्नों के बाद दिए हैं; पहले स्वयं करके देखें।
- "कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि।"
- "कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाइ।"
- "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।"
- "मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप परयो प्रभात।"
- "चरन कमल बंदौं हरि राई।"
- "उसका चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा।"
- "सागर भी रात में सोते-सोते करवट बदल रहा था।"
- "इतनी तेज़ दौड़ा कि हवा भी पीछे रह गई।"
उत्तर
- अनुप्रास: "क" और "न" वर्ण की आवृत्ति।
- यमक: "कनक" दो बार; पहला धतूरा, दूसरा सोना।
- श्लेष: "पानी" के एक साथ कई अर्थ: चमक, प्रतिष्ठा और जल।
- उत्प्रेक्षा: "मनहुँ" से कल्पना।
- रूपक: चरण ही कमल है, वाचक शब्द नहीं।
- उपमा: "की तरह" वाचक शब्द है; चेहरा उपमेय, गुलाब उपमान, खिल उठना साधारण धर्म।
- मानवीकरण: सागर का सोना और करवट बदलना मानवीय क्रियाएँ हैं।
- अतिशयोक्ति: हवा का पीछे रह जाना बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है।
लिखने में अलंकार का उपयोग
अलंकार सिर्फ़ परीक्षा का विषय नहीं है। निबंध, भाषण, कविता और विज्ञापन-लेखन में भी इनका उपयोग होता है, पर संयम के साथ। हर वाक्य में अलंकार ठूँसना भाषा को कृत्रिम बना देता है। एक अच्छा नियम यह है कि एक अनुच्छेद में एक जगह उपमा, रूपक या अनुप्रास रखें, जहाँ भाव सबसे अधिक है, और बाक़ी भाषा सरल रखें।
अगर आप अपना कोई अनुच्छेद या कविता बना रहे हैं, तो ये काम के साधन हैं:
- हिंदी पर्यायवाची शब्द टूल उपयुक्त शब्द खोजने में मदद करता है, ताकि अनुप्रास या यमक के लिए ध्वनि के अनुसार विकल्प मिल सकें। AI से मिले सुझावों को अर्थ की दृष्टि से स्वयं जाँच लीजिए।
- हिंदी शब्दकोश और शब्द जाँच में किसी शब्द का मानक रूप देखा जा सकता है। यह जाँच आपके ब्राउज़र में चलती है और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक वर्तनी-नियमों पर आधारित है।
- हिंदी कविता जनरेटर आपके विषय और शब्दों से मौलिक पंक्तियाँ बनाता है। वह मौलिक पंक्तियाँ बनाने के निर्देश पर चलता है, लेकिन तुक, मात्रा या छंद की शुद्धता हर भाषा में जाँची नहीं गई है, इसलिए छंद-शास्त्र के अनुसार जाँच आपको स्वयं करनी होगी।
- हिंदी स्पेल चेकर लिखे हुए अनुच्छेद की वर्तनी की चूक पकड़ता है। वह अलंकार की सही पहचान नहीं कर सकता और हर चूक नहीं पकड़ता।
हर टूल एक बार में 6,000 अक्षर तक का पाठ लेता है। ये टूल लेखन में सहायता के लिए हैं; अलंकार की परिभाषा और पहचान आपको अपनी पाठ्यपुस्तक से मिलानी चाहिए।
काव्य-शास्त्र से जुड़े बड़े विषय, जैसे रस और छंद, के लिए काव्य के तत्व: रस, छंद और अलंकार की मार्गदर्शिका देखें, और अलंकार के एक-एक भेद पर विस्तार के लिए रूपक अलंकार, अनुप्रास अलंकार और उपमा अलंकार के पृष्ठ।
परीक्षा से पहले की जाँच-सूची
- क्या मैं शब्दालंकार और अर्थालंकार की कसौटी (पर्यायवाची बदलकर देखना) समझा सकता हूँ?
- क्या यमक और श्लेष का अंतर उदाहरण सहित लिख सकता हूँ?
- क्या उपमा के चारों अंग पंक्ति में पहचान पाता हूँ?
- क्या रूपक में वाचक शब्द की अनुपस्थिति जाँचता हूँ?
- क्या उत्प्रेक्षा के संकेत-शब्द (मानो, मनहुँ, जनु) याद हैं?
- क्या हर अलंकार की परिभाषा और एक उदाहरण पक्का है?
- क्या अपनी पाठ्यपुस्तक के उदाहरण भी एक बार दोहरा लिए हैं?
टूल आज़माएँ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अलंकार की परिभाषा क्या है?
अलंकार का अर्थ आभूषण है। काव्य में जो शब्द या अर्थ के चमत्कार से उसकी शोभा बढ़ाए, उसे अलंकार कहते हैं। इसके दो मुख्य वर्ग हैं: शब्दालंकार, जिसमें चमत्कार शब्द में होता है, और अर्थालंकार, जिसमें चमत्कार अर्थ में होता है।
शब्दालंकार और अर्थालंकार में क्या अंतर है?
शब्दालंकार में चमत्कार शब्द की ध्वनि या बनावट में होता है, इसलिए पर्यायवाची रखने पर वह चला जाता है। अनुप्रास, यमक और श्लेष इसके उदाहरण हैं। अर्थालंकार में चमत्कार अर्थ में होता है और शब्द बदलने पर भी बना रहता है, जैसे उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा।
उपमा और रूपक अलंकार में अंतर कैसे पहचानें?
उपमा में उपमेय और उपमान की समानता बताई जाती है और सा, सी, जैसा, समान जैसा वाचक शब्द रहता है। रूपक में उपमेय को ही उपमान कह दिया जाता है, इसलिए वाचक शब्द नहीं होता। "कमल-से नयन" उपमा है, "नयन कमल" रूपक।
यमक और श्लेष अलंकार में क्या फ़र्क है?
यमक में एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है, जैसे बिहारी के दोहे में "कनक"। श्लेष में एक ही शब्द से एक साथ कई अर्थ निकलते हैं, जैसे रहीम की पंक्ति में "पानी"। उत्तर में अर्थ की व्याख्या अवश्य लिखें।
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